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Thursday, 22 October 2026
हरदा

मानसिक रोगों के उपचार में नई तकनीकें अधिक प्रभावी 

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मानसिक रोगों पर हुई एक दिवसीय कार्यशाला

 


अनोखा तीर, भोपाल। मानसिक रोगों के उपचार में तेजी से उभर रही रिपीटेटिव ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन और डीप तकनीकों पर आधारित एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन रविवार को ताज लेक फ्रंट में किया गया। कार्यशाला में देशभर के मनोरोग विशेषज्ञों, न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन, मनोवैज्ञानिकों और चिकित्सा छात्रों ने भाग लिया। कार्यक्रम में भोपाल न्यूरो साइकियाट्रिक क्लिनिक एंड डायग्नोस्टिक सेंटर के डायरेक्टर प्रो. (डॉ.) आर.एन. साहू तथा जसलोक हॉस्पिटल, मुंबई के न्यूरो सर्जरी विभाग के डायरेक्टर प्रो. (डॉ.) परेश दोशी ने मानसिक रोगों के उपचार में अत्याधुनिक तकनीकों की उपयोगिता और उनके लाभों की जानकारी दी। स्वागत उद्बोधन में डॉ. आर.एन. साहू ने बताया कि कार्यशाला में निम्हांस (बेंगलुरु), सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री (रांची) और कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज (मंगलुरु) सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हुए। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के चिकित्सकों को मानसिक स्वास्थ्य उपचार की आधुनिक तकनीकों से परिचित कराना इस कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य है। डॉ. साहू ने बताया कि दोनों ही अत्याधुनिक, सुरक्षित और बिना शल्यक्रिया (नॉन-इनवेसिव) वाली तकनीकें हैं, जिनमें चुंबकीय तरंगों के माध्यम से मस्तिष्क के विशिष्ट भागों को सक्रिय किया जाता है। ये तकनीकें दवाओं से नियंत्रित न होने वाले अवसाद, ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर, सिजोफे्रनिया, नशा मुक्ति, चिंता संबंधी विकारों के साथ-साथ पार्किंसन रोग, स्ट्रोक के बाद पुनर्वास, माइग्रेन और अन्य न्यूरोलॉजिकल रोगों के उपचार में भी प्रभावी साबित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि इन उपचार पद्धतियों की जानकारी आमजन तक पहुंचना आवश्यक है। प्रो. डॉ. परेश दोशी ने कहा कि आने वाले वर्षों में ब्रेन स्टिमुलेशन तकनीकें मनोरोग, न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। इनके माध्यम से रोगियों को अधिक प्रभावी, सुरक्षित और कम दुष्प्रभाव वाले उपचार उपलब्ध होंगे। उन्होंने बताया कि नई उपचार पद्धति के अब तक बेहतर परिणाम सामने आए हैं और डिप्रेशन सहित कई मानसिक रोगों के उपचार में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सफदरजंग हॉस्पिटल, नई दिल्ली के प्रो. डॉ. निशांत गोयल ने न्यूरोमॉड्यूलेशन की उपयोगिता पर विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि इस क्षेत्र में कार्यरत चिकित्सकों को नवीनतम तकनीकों की जानकारी होना आवश्यक है। उन्होंने राज्य के प्रमुख अस्पतालों में न्यूरोमॉड्यूलेशन तकनीक विकसित करने पर भी जोर दिया और बताया कि यह तकनीक गर्भवती महिलाओं के लिए भी सुरक्षित मानी जाती है। उन्होंने उपचार में तकनीकी दक्षता के साथ बेहतर डॉक्यूमेंटेशन और उपचार संबंधी त्रुटियों से बचने की आवश्यकता पर भी बल दिया। कार्यशाला के दौरान अत्याधुनिक आरटीएमएस और डीप टीएमएस उपकरणों का प्रदर्शन भी किया गया। कार्यशाला की समन्वयक गांधी मेडिकल कॉलेज की सहायक प्राध्यापक डॉ. समीक्षा साहू ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि कार्यशाला का उद्देश्य मनोरोग विशेषज्ञों, न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जनों, मनोवैज्ञानिकों और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को न्यूरोमॉड्यूलेशन की नवीनतम तकनीकों एवं उनके व्यावहारिक उपयोग से अवगत कराना है।

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