-खाद-बीज और दवाइयों की बढ़ी कीमतों से बिगड़ा खेती का बजट
अनोखा तीर, मसनगांव। खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले किसानों को खेती के लिए अधिक बजट की व्यवस्था करनी पड़ रही है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष खाद, बीज एवं रासायनिक दवाइयों की कीमतों में वृद्धि होने से खेती की लागत बढ़ गई है। किसानों का कहना है कि बढ़ती महंगाई के कारण खेती का बजट गड़बड़ा गया है। सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों के बीज 9 हजार से 18 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक बिक रहे हैं, जिससे किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है। वहीं फसलों में उपयोग होने वाले उर्वरकों के दाम बढ़ने से लागत में और वृद्धि हो रही है। सोयाबीन की फसल में सबसे अधिक उपयोग होने वाला डीएपी खाद सहकारी समितियों में उपलब्ध नहीं है, जबकि उसके विकल्प के रूप में उपलब्ध एनपीके खाद किसानों को महंगे दामों पर मिल रहा है। डीजल एवं कृषि रसायनों की बढ़ी कीमतों से भी किसान प्रभावित हो रहे हैं। क्षेत्र में खरीफ सीजन की मुख्य फसल सोयाबीन एवं मक्का की बुवाई की तैयारियां तेज हो गई हैं। कुछ किसानों ने मक्का की बुवाई शुरू कर दी है, लेकिन अधिकांश किसानों को समय पर डीएपी नहीं मिल पा रहा है। समितियों में खाद उपलब्ध नहीं होने से किसान बाजार एवं गोदामों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। डीएपी जहां करीब 1,350 रुपए प्रति बोरी में मिलता है, वहीं विकल्प के रूप में सुझाया जा रहा 12:32:16 एनपीके करीब 2,450 रुपए प्रति बोरी तक पहुंच गया है। अन्य एनपीके एवं एनपी खाद भी डीएपी की तुलना में महंगे हैं। किसान राधेश्याम विश्वकर्मा, कैलाश नामदेव, आनंद पाटील एवं उमेश जोशी का कहना है कि एक ओर मानसून की देरी से बुवाई प्रभावित हो रही है, वहीं दूसरी ओर खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। ट्रैक्टर से बोनी एवं बखरनी कर खेत तैयार करने में डीजल की बढ़ी कीमतों के कारण हजारों रुपए खर्च हो रहे हैं। अब खाद की महंगाई ने भी किसानों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे खेती का पूरा गणित बिगड़ने लगा है।
टोकन सिस्टम बना नई मुसीबत
शासन द्वारा लागू की गई टोकन एवं पंजीयन व्यवस्था भी किसानों के लिए परेशानी का कारण बन गई है। कई किसान अभी तक अपनी आईडी बनवाने के लिए समितियों एवं कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। जिन किसानों का पंजीयन हो चुका है, वे खाद नहीं मिलने से परेशान हैं। किसानों का आरोप है कि व्यवस्था सुधारने के नाम पर प्रक्रियाएं इतनी जटिल हो गई हैं कि बुवाई के महत्वपूर्ण समय में किसान कागजी कार्रवाई में उलझ गए हैं।
खाद नहीं तो कैसे होगी बुवाई?
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बुवाई के शुरुआती दौर में डीएपी की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण होती है। यदि समय पर खाद नहीं मिली तो फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। किसानों का कहना है कि सरकार हर वर्ष खाद की उपलब्धता के दावे करती है, लेकिन सीजन शुरू होते ही समितियों से डीएपी गायब हो जाना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। इस संबंध में समिति के सहायक प्रबंधक अखिलेश पाटिल ने बताया कि किसान अपना ऋण जमा कर टोकन जनरेट कर समिति से खाद प्राप्त कर सकते हैं। समिति में खरीफ सीजन के लिए एनपी 12-32-16, 20-20-13, 16-20-0-13 तथा यूरिया उपलब्ध है। जिला विपणन संघ अधिकारी योगेश मालवीय ने बताया कि जिले में डीएपी उपलब्ध नहीं है। किसान फसलों में एनपीके का उपयोग कर अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। एनपीके एवं यूरिया पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं तथा किसान टोकन जनरेट कर खाद प्राप्त कर सकते हैं।





