अनोखा तीर, हरदा। जैन धर्म में त्याग को सर्वोच्च महत्व दिया गया है, लेकिन यह त्याग किसी दबाव या शर्त पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की सामर्थ्य और स्वेच्छा पर आधारित होता है। यह विचार प.पू. गणाचार्य विरागसागर महाराज के सुशिष्य प.पू. उपाध्यायश्री विशेषसागर महाराज ने हरदा में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उपाध्यायश्री ने कहा कि धन की तीन गतियां बताई गई हैं-दान, भोग और नाश। इनमें धार्मिक एवं पुण्य कार्यों में धन का दान करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है। उन्होंने कहा कि धन कमाने के अवसर जीवन में अनेक बार मिल सकते हैं, लेकिन धर्म और पुण्य अर्जित करने का अवसर विरले ही प्राप्त होता है। पुण्यात्मा जीव ही अपने पुण्य के प्रभाव से और अधिक पुण्य कमा सकता है। उन्होंने कहा कि इस जन्म में अर्जित की गई धन-संपत्ति अगले जन्म में साथ नहीं जाती, जबकि पुण्य कर्म जीव के साथ भव-भव तक चलते हैं और उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। प्रवचन के दौरान उपाध्यायश्री ने आगम का उल्लेख करते हुए कहा कि भक्ति मुक्ति की दात्री है। भक्ति से शक्ति प्राप्त होती है, शक्ति से युक्ति और अंतत: भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा कि भक्ति एक ऐसा सेतु है, जिसके सहारे जीव संसार रूपी भवसागर को पार कर सकता है। जिनेंद्र भगवान की भक्ति से दुर्लभ से दुर्लभ कार्य भी सहज रूप से सिद्ध हो जाते हैं। प्रवचन से पूर्व क्षुल्लिका 105 विजिताश्री माताजी ने अपने उद्बोधन में गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जिसके जीवन में गुरु नहीं, उसका जीवन प्रारंभ ही नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि गुरु कृपा से ही विद्या, ज्ञान और मंत्रों की सिद्धि प्राप्त होती है तथा जीवन को सही दिशा मिलती है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने उपदेशों का लाभ लेकर धर्म, दान, भक्ति एवं गुरु भक्ति के महत्व को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
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