अस्पतालों, बीमा कंपनियों एवं टीपीए के कुचक्र से मरीजों को राहत मिले : प्रवीण खंडेलवाल

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अनोखा तीर, हरदा। देशभर में लाखों मरीज, जिन्होंने अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए मेडिकल इंश्योरेंस लिया है, आज उसी व्यवस्था के कारण मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानियां झेलने को मजबूर हैं। कैट जिला अध्यक्ष सरगम जैन ने बताया कि इस गंभीर और जनहित से जुड़े विषय पर चांदनी चौक से सांसद एवं कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जयप्रकाश नड्डा को पत्र लिखकर अस्पतालों से डिस्चार्ज के समय टीपीए, बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच होने वाली अनावश्यक देरी समाप्त करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, महंगे बीमा प्रीमियम और कैशलेस इलाज की व्यवस्था के बावजूद यदि मरीज को अस्पताल से छुट्टी पाने के लिए घंटों या पूरा दिन प्रतीक्षा करनी पड़े, तो यह पूरी व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इलाज पूरा होने और डॉक्टर द्वारा फिट घोषित किए जाने के बाद भी मरीजों को केवल फाइलों, ई-मेल, दस्तावेजों और औपचारिक अनुमोदनों के नाम पर अस्पतालों में रोके रखना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। उन्होंने इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के चेयरमैन को भी पत्र भेजकर बीमा कंपनियों और टीपीए के लिए सख्त एवं समयबद्ध दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि लोग स्वास्थ्य बीमा इसलिए लेते हैं ताकि बीमारी के समय आर्थिक सुरक्षा और मानसिक राहत मिल सके, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में बीमा सुविधा राहत के बजाय कई मामलों में प्रशासनिक प्रताड़ना  का कारण बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि देशभर में लाखों बीमाधारक मरीजों को उपचार पूरा होने और डॉक्टर द्वारा छुट्टी दिए जाने के बावजूद घंटों तक अस्पतालों में केवल इसलिए रोके रखा जाता है क्योंकि टीपीए, बीमा कंपनियां और अस्पताल आपस में औपचारिकताओं और स्वीकृतियों के नाम पर फाइलें घुमाते रहते हैं। कई बार पहले से स्वीकृत इलाज के बावजूद अंतिम डिस्चार्ज के समय नए प्रश्न खड़े किए जाते हैं, अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाते हैं और भुगतान की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाली जाती है। प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि यह केवल असुविधा का विषय नहीं, बल्कि गंभीर मानवीय और सामाजिक मुद्दा है। अस्पतालों में अतिरिक्त समय तक रुकने के कारण मरीजों को अतिरिक्त बेड चार्ज, दवाइयों और अन्य खर्चों का बोझ उठाना पड़ता है। दूर-दराज से आए परिवारों को यात्रा, रहने और भोजन की अतिरिक्त परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं और गंभीर बीमारी से उबर रहे मरीजों के लिए यह स्थिति और अधिक कष्टदायक हो जाती है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य बीमा और कैशलेस इलाज व्यवस्था का मूल उद्देश्य मरीज को राहत और सुरक्षा देना था, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में मरीज अस्पताल, बीमा कंपनी और टीपीए के कुचक्र में फंस जाता है। उपचार के बाद भी मरीज और उसका परिवार प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बंधक बनकर रह जाते हैं। इससे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और बीमा क्षेत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा होता है। उन्होंने कहा कि अस्पताल डिस्चार्ज प्रक्रिया समय रहते शुरू नहीं करते, टीपीए बार-बार नए दस्तावेज मांगते हैं और बीमा कंपनियां स्पष्ट जवाबदेही से बचती हैं। छुट्टियों, रविवार और देर रात के समय स्थिति और गंभीर हो जाती है क्योंकि संबंधित अधिकारी उपलब्ध नहीं होते। कई अस्पतालों में मरीजों को यह कहकर रोका जाता है कि फाइनल अप्रूवल नहीं आया है, जबकि इलाज की मंजूरी पहले ही मिल चुकी होती है। प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि यदि डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन भुगतान जैसी सेवाएं कुछ मिनटों में संभव हैं, तो अस्पताल डिस्चार्ज जैसी संवेदनशील प्रक्रिया घंटों तक लंबित रहना पूरी तरह अनुचित है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि डिस्चार्ज दस्तावेज जमा होने के बाद 1 से 2 घंटे के भीतर अंतिम टीपीए स्वीकृति अनिवार्य की जाए। तय समय में जवाब नहीं मिलने पर डीम्ड अप्प्रूवल मानकर मरीज को तत्काल जाने दिया जाए। उन्होंने अनावश्यक देरी पर अस्पताल, टीपीए और बीमा कंपनियों की स्पष्ट जवाबदेही तय करने, पूरी प्रक्रिया के लिए एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने, क्लेम क्लियरेंस सुविधा उपलब्ध कराने तथा मरीजों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने की मांग भी की। साथ ही सुझाव दिया कि अस्पतालों को डिस्चार्ज से कई घंटे पहले ही बीमा एवं टीपीए संबंधी औपचारिकताएं शुरू करने के निर्देश दिए जाएं, ताकि अंतिम समय में मरीजों को अनावश्यक प्रतीक्षा न करनी पड़े। उन्होंने कहा कि मरीज कोई फाइल नहीं बल्कि संवेदनशील मानव जीवन है और उसके सम्मान एवं सुविधा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने आशा व्यक्त की कि केंद्र सरकार और संबंधित नियामक संस्थाएं इस विषय पर प्राथमिकता के आधार पर निर्णय लेकर देश के करोड़ों बीमाधारक मरीजों और उनके परिवारों को राहत प्रदान करेंगी।
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