जो अपनी इच्छाओं को जीत लेता है, वही ईश्वर के निकट पहुंचता है : पं. विद्याधर  

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-श्रीराम कथा का तृतीय दिवस भगवान शिव-पार्वती के विवाह प्रसंग सुनाया
अनोखा तीर, हरदा। खेड़ीपुरा स्थित खेड़ापति मंदिर के समीप मुख्य मार्ग पर आयोजित संगीतमय श्रीराम कथा के तृतीय दिवस श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यास पं. विद्याधर उपाध्याय ने शिव-पार्वती विवाह, नारद मोह एवं पार्वती तपस्या के प्रसंगों का अत्यंत भावपूर्ण और सारगर्भित वर्णन किया। इस अवसर पर मुख्य यजमान माखनलाल घागरे एवं भगत चंदेवा विशेष रूप से उपस्थित रहे। कथा स्थल ‘जय श्रीरामÓ के गगनभेदी उद्घोषों से गूंजता रहा, वहीं संगीतमय भजनों ने संपूर्ण वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। आयोजन समिति से राजू हरने ने बताया कि तृतीय दिवस की कथा में पं. उपाध्याय ने जीवन का महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि साधन अनेक हो सकते हैं, लेकिन साध्य एक ही होता है—प्रभु की प्राप्ति। उन्होंने कहा कि भक्ति के मार्ग भले ही अलग-अलग हों, लेकिन भगवान तक पहुंचने का लक्ष्य एक ही होता है। कथा व्यास ने बताया कि ईश्वर हमें वही प्रदान करते हैं, जिसमें हमारा वास्तविक कल्याण निहित होता है। यदि कोई इच्छा पूरी नहीं होती, तो उसे भगवान की कृपा समझना चाहिए। उन्होंने कामनाओं पर नियंत्रण का संदेश देते हुए कहा कि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है, जो साधना और भक्ति में बाधा बनती है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं को जीत लेता है, वही ईश्वर के सबसे निकट पहुंचता है। गुरु, माता और पिता की आज्ञा के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने माता पार्वती का उदाहरण प्रस्तुत किया। सप्तऋषियों द्वारा परीक्षा लिए जाने पर भी पार्वती गुरु वचनों पर अडिग रहीं और अपने संकल्प से विचलित नहीं हुईं। उन्होंने कहा कि गुरु वचन पर अटल विश्वास ही साधक को सिद्धि तक पहुंचाता है।  कथा के प्रमुख प्रसंग में नारद मोह का वर्णन करते हुए बताया गया कि जब तप और साधना में अहंकार आ जाता है, तब भगवान स्वयं भक्त का कल्याण करने के लिए उसका मोह भंग करते हैं। नारद के अहंकार को तोड़ने हेतु भगवान ने उन्हें वानर रूप का अनुभव कराया। पार्वती तपस्या और कामदेव दहन प्रसंग में बताया गया कि तारकासुर वध के लिए शिव पुत्र का जन्म आवश्यक था। देवताओं द्वारा कामदेव को भगवान शिव की समाधि भंग करने भेजा गया, लेकिन शिव के तीसरे नेत्र से कामदेव भस्म हो गए। बाद में रति की प्रार्थना पर भगवान शिव ने वरदान दिया कि द्वापर युग में कामदेव श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे। अंतत: ब्रह्मा जी, भगवान श्रीराम एवं देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव विवाह के लिए सहमत हुए। भूत-प्रेत, गणों और विचित्र स्वरूपों से सजी शिव बारात के साथ हिमालय में भगवान शिव और माता पार्वती का पाणिग्रहण संस्कार विधि-विधान से संपन्न हुआ। कथा के समापन पर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और कथा स्थल देर तक जय श्रीराम के उद्घोषों से गूंजता रहा। आयोजन समिति ने जानकारी दी कि श्रीराम कथा के आगामी दिवस भगवान श्रीराम के जन्म का अत्यंत भावपूर्ण एवं मंगल प्रसंग सुनाया जाएगा, जिसे लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।

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