साहित्य की अनमोल धरोहर है अजातशत्रु

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प्रहलाद शर्मा 

आज मध्यप्रदेश स्थापना दिवस के अवसर पर हम बीते 66 वर्षों की विकास यात्रा पर स्वयं को बहुत आलादित महसूस कर रहे है। इन 66 वर्षों में जो उपलब्धियां प्रदेश ने हासिल की है उसको लेकर भी प्रदेश के कलमकारों द्वारा बहुत कुछ लिखा बोला जाएगा। लेकिन मैं आज इस सबसे हटकर उस व्यक्ति की जीवन यात्रा पर कुछ प्रकाश डालने जा रहा हूं जिन्होंने मध्यप्रदेश ही नहीं अपितु संपूर्ण भारत को अपनी लेखनी के माध्यम से एक दिशा देने का प्रयास किया है। मैं बात कर रहा हूं संचार क्रांति के इस युग में सोशल मीडिया जैसे प्लेटफार्म से दूर अपनी फक्कड़ मिजाजी की जिंदगी कीपेड मोबाईल तक सीमित रखते हुए जीने वाले प्रोफेसर आर.एस. यादव की, जिन्हें साहित्यिक जगत में अजात शत्रु के नाम से जाना जाता है। हिन्दुस्तान के विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में वर्षों तक अपने व्यंग्य लेखन के माध्यम से समाज और व्यवस्थाओं पर तीखे व्यंग्य प्रहार करने वाले अजात शत्रु की प्रशंसा मध्यप्रदेश के ही ख्यातनाम व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई भी करते थे। शरद जोशी और हरिशंकर परसाई के समकालीन अजातशत्रु ने न केवल व्यंग्य लेखन ही किया अपितु फिल्मी दुनिया में भी अपने डायलॉग लेखन तथा लता मंगेशकर, आशा भोंसले और मोहम्मद रफी जैसे गायक कलाकारों के गीतों की सूक्ष्म समीक्षा करते हुए उन पर किताबें भी लिखी है। नवभारत नागपुर ने व्यंगकार शरद जोशी के कॉलम व्यंग्यकार की डायरी के लिए शरद जोशी को हटाकर अजात शत्रु से यह कॉलम लिखाना शुरु किया था। भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर के अनेक साक्षात्कारों सहित उनके गाये 80 उत्कृष्ट गीतों की समीक्षा पर जो किताब लिखी थी उसका विमोचन देश के राष्ट्रपति स्व. शंकरदयाल शर्मा ने स्वयं लता जी की उपस्थिति में किया था। आज मैं ऐसे प्रथम श्रेणी के साहित्यकार प्रो. आर.एस. यादव उर्फ अजात शत्रु के निजी जीवन से आपको वाकिफ कराना चाहता हूं। चूंकि साहित्यकार अजात शत्रु मध्यप्रदेश की अनमोल धरोहर भी है।

अजात शत्रु का जन्म 5 मई 1942 को विर्दभ प्रदेश (वर्तमान मध्यप्रदेश) के खंडवा जिले की हरसूद तहसील अंतर्गत पिपलानी रेलवे स्टेशन के पास एक रेलवे क्वार्टर में हुआ था। यहां उनके नानाजी स्व. हरभजन यादव रेलवे में सेवारत थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा महाराष्ट्र के भुसावल में हुई। जहां उनके पिता कालीचरण यादव रेलवे में ट्रेन एक्जामिनर के पद पर कार्यरत थे। पिता का स्थानांतरण खंडवा होने के उपरांत कक्षा चौथी से एमए इंग्लिश तक की शिक्षा खंडवा में ही प्राप्त की। उच्च द्वितीय श्रेणी एमए इंग्लिश होने के कारण कॉलेज में नौकरी के लिए अपना पहला इंटरव्यूव 1966 में हरदा कॉलेज में दिया था। वहीं दूसरे दिन कुसुम महाविद्यालय सिवनी मालवा में भी साक्षात्कार था तो वहां भी साक्षात्कार देने पहुंच गए। इस महाविद्यालय ने उनका चयन कर लिया था। जहां कुछ महीने ही अपनी सेवाएं दे पाए थे कि सरकार ने इमरजेंसी नौकरी में उन्हें बिलासपुर शासकीय गल्र्स डिग्री कॉलेज के लिए चयनित कर लिया। परंतु तब सरकार की नीति अनुसार 6 माह पश्चात पीएससी की परीक्षा देना भी अनिवार्य था। इसी दौरान एक दिन रेलवे प्लेटफार्म पर चने चटकारे खाने वाले कागज में उल्हासनगर मुंबई के सीएचएम कॉलेज का विज्ञापन पढऩे को मिला। उन्होंने जब वहां जाकर साक्षात्कार दिया तो उनका चयन हो गया। सन् 1968 से 2002 तक इसी कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर के रुप में सेवाएं देते हुए सेवानिवृत्त हुए। अपने शिक्षाकाल में ही नानाजी होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) जिले के पलासनेर रेलवे स्टेशन पर स्थानांतरित होकर आ गए थे। जहां उन्होंने अपना स्थायी निवास भी बना लिया था। यही कारण था कि पिता भी पलासनेर आकर ही रहने लगे। आज अजात शत्रु का परिवार चाहे स्थायी रुप से उल्हास नगर में रहता है लेकिन वह अपने ग्राम पलासनेर आकर फक्कड़ जीवन जीते हुए जो आत्मसंतुष्टि महसूस करते है वह उन्हें मुंबई की आबोहवा में नहीं मिलती।

अजातशत्रु की साहित्य यात्रा

अजात शत्रु ने लेखन का कार्य अपनी 8 वीं कक्षा दौरान शुरू कर दिया था। उन्होंने पहली कहानी ‘बैल’ लिखी थी। परंतु व्यंग्यकार के रुप में सर्वाधिक चर्चित सन् 1968 में नवभारत टाईम्स में प्रकाशित व्यंग्य ‘जब चांद पर चढ़ा आदमी’ से हुए। उसके बाद राष्ट्रीय पत्रिकाएं धर्मयुग, सारिका, कादिम्बनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान सहित पंजाब केसरी, दैनिक जागरण, जनसत्ता तथा नवभारत टाईम्स जैसे अनेक अखबारों में प्रकाशित होते रहे। इस दौरान नवभारत नागपुर में व्यंग्यकार की डायरी कॉलम का लेखन शरद जोशी द्वारा किया जाता था। परंतु किसी कारणवश अखबार ने शरद जोशी के बजाए यह कॉलम अजात शत्रु से लिखवाना शुरु कर दिया। यही दौर था जब हरिशंकर परसाई भी अपने व्यंग्य लेखन के माध्यम से साहित्य के क्षेत्र में एक पहचान कायम कर चुके थे। लेकिन स्वयं श्री परसाई अजात शत्रु को श्रेष्ठ व्यंग्यकार मानते थे। व्यंग्य लेखन के साथ ही उल्हास नगर मुंबई में रहने तथा खंडवा में शिक्षा दौरान दादामुनी अशोक कुमार से हुई मित्रता के चलते फिल्मी दुनिया में भी अपनी छाप कायम करने में सफल हुए। फिल्म निर्माता व डायरेक्टर बी.के. आदर्श के संपर्क में आने के पश्चात फिल्मों के लिए डायलॉग लिखने का कार्य भी शुरु कर दिया। जहां फिल्मी दुनिया के मशहूर कलाकार कादर खान खुद डायलॉग लिखते थे वहीं अजात शत्रु ने कादर खान के लिए भी फिल्म गुप्त ज्ञान में डायलॉग लिखे। वहीं फिल्म नागफनी के लिए संवाद तथा पटकथा, डायलॉग, स्क्रीनप्ले सभी अजात शत्रु द्वारा लिखा गया। डायलॉग लेखन के चलते ही आपकी दोस्ती फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा से हुई। वहीं अपने घनिष्ठ मित्रों में अभिनेता प्राण को भी मानते रहे है। इसी दौरान स्वर कोकिला लता मंगेशकर के गाये पुराने गीतों की समीक्षा ने उन्हें लता जी के इतने करीब ला दिया कि लता जी उन्हें अपना भाई मानने लगी। लता जी के गाये गानों की समीक्षा को लेकर नईदुनिया इंदौर ने अजात शत्रु के नाम पर गीत गंगा कॉलम प्रारंभ कर दिया। जिसमें वह लगभग 36 वर्षों तक लिखते रहे। इस दौरान उन्होंने लता जी पर गाए गीतों की किताब ‘बाबा तेरी सोनचिरैया’ लिखी। जिसका विमोचन एक भव्य समारोह दौरान लता मंगेशकर की उपस्थिति में राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने किया। वहीं लता जी के गीतों पर ही ‘लता और सफर के साथी’, आशा जी के गीतों पर ‘सदियों में एक आशा’, ‘अंजाने गायक अनसुने गीत’ ‘एक मशाल आजादी के तरानों की’ जैसी अनेक किताबों के लिए लेखन किया। इसी तरह गीतकार मोहम्मद रफी के गाए गीतों पर तथा मध्यप्रदेश लघु फिल्म निगम द्वारा प्रकाशित किताब अशोक कुमार का लेखन भी किया। मध्यप्रदेश सरकार के लिए आदिवासी जनजाति संग्रहालय हेतु भी किताब का लेखन किया गया। इतना ही नहीं बल्कि इंग्लैंड की प्रसिद्ध उपन्यासकार ऐमिली ब्रॉन्टी के उपन्यास वदरिंग हाइट्स का हिन्दी अनुवाद किया, जिस पर फिल्म दिल दिया दर्द लिया बनी हुई है। राष्ट्रीय पटल पर लम्बे समय तक लेखन करने वाले इन हरफनमौला साहित्यकार का सर्वाधिक लगाव अपने अंचल की माटी और वहां के दीनहीन लोगों से सदैव ही बना रहा है। यही कारण है कि जहां वह अपने उच्च कोटि के साहित्य और व्यंग्य लेखों से देश दुनिया को दिशा देने का कार्य करते थे तो वहीं अपने क्षेत्र की छोटी-छोटी समस्याओं और शासन की योजनाओं के क्रियान्वयन सहित राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर हरदा से प्रकाशित साप्ताहिक वाईस ऑफ हरदा में घंटाघर से बाबूलाल कॉलम लोकभाषा में लिखा करते थे। उनके इन्हीं देशज भाषा के व्यंग्य लेखों को लेकर ‘शर्म कीजिए श्रीमान’ किताब का प्रकाशन भी हुआ। वहीं जब दैनिक अनोखा तीर अखबार का प्रकाशन हरदा से शुरु हुआ तो आपने ‘मत चूके चौहान’ व्यंग्य कॉलम के माध्यम से पाठकों को गुदगुदाया।

जब अनोखा तीर के लिए की लाईव रिपोर्टिंग

देश के ऐसे ख्यातनाम साहित्यकार, व्यंग्यकार, फिल्म समीक्षक, फिल्म डायलॉग लेखक प्रो. आर.एस. यादव ‘अजात शत्रु’ का सानिध्य मुझे विगत 35 वर्षों से मिलता रहा है। आज मैं यह लिखते हुए गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं कि ऐसे प्रख्यात साहित्यकार ने अपने जीवनकाल में पहली बार दैनिक अनोखा तीर के लिए जनता के बीच पहुंचकर जरुरतमंद गरीबों की पीड़ा से रुबरु होते हुए लाईव रिपोर्टिंग भी की। महज दो दिन की इस लाइव रिपोर्टिंग से प्रशासन के आलाधिकारी मानों सकते में आ गए थे। तब नर्मदापुरम् संभाग के संभागायुक्त मनोज श्रीवास्तव ने स्वयं मुझसे चर्चा कर कहा था कि प्रहलाद अजात शत्रु जी से यह क्या करवा रहे हो? ऐसी रिपोर्टिंग से क्या कलेक्टर के प्राण लोंगे? उन्होंने स्वयं अजात शत्रु जी से निवेदन कर लाईव रिपोर्टिंग न करने की बात कही। दैनिक अनोखा तीर के आग्रह पर ही वह विगत 6 वर्षों से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के जन्मदिन पर प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका ‘मैं हूं ना’ के लिए लेख अथवा शिवराज जी पर अपने विचार व्यक्त करते रहे। जिन्हें प्रकाशित कर हम फर्क महसूस करते रहे। यह फक्कड़मिजाज साहित्यकार दीन दुनिया की लाग लपेट से दूर, स्वयं के नाम की ख्याति या मंचीय सम्मानों से परहेज रखते हुए हरदा जिले के नजदीकी ग्राम पलासनेर में वर्ष में दो बार आकर अपने ग्रामीणों के बीच सादा जीवन जीते है। उनका मानना है कि मैनें अभी तक जिंदगी के बारे में लिखा, अब मैं जिंदगी हूं। अपनी लेखनी यात्रा में उपनिषेदों पर लिखने में सर्वाधिक आनंद की प्राप्ति बताने वाले अजात शत्रु अपने समकालीन व्यंग्यकारों पर भी बेबाक टिप्पणी करते है। उन्होंने कहा कि शरद जोशी माचिस थे तो हरिशंकर परसाई जलती हुई तीली थे। वैसे तो इस ख्यातनाम व्यंग्यकार को लेकर अगर किताब भी लिखी जाए तो कमतर है, लेकिन मुझे लगा कि अपने जीवनकाल में 50 वर्षों से भी अधिक लेखन सफर करने वाले साहित्यकार अजात शत्रु से वर्तमान पीढ़ी के पाठकों को अवगत कराया जाना आवश्यक है। चूंकि वह इंटरनेट या सोशल मीडिया जैसे किसी प्लेटफार्म का उपयोग कर स्वयं को प्रचारित नहीं करते है ऐसी स्थिति में न तो आज की पीढ़ी और न वर्तमान सरकार प्रदेश की ऐसी धरोहर से वाकिफ हो सकती है जिसने साहित्य को ओढ़ा बिछाया और पिया है।

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