दैनिक अनोखा तीर, हरदा। इन दिनों हरदा शहर में बिजली व्यवस्था को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल की यादें ताजा हो रही हैं। गर्मी के दिनों में रखरखाव के नाम पर घोषित कटौती करने वाले बिजली विभाग की हकीकत पहली बरसात से ही सामने आने लगी है। इन दिनों हरदा जिला मुख्यालय की बदहाली देखते हुए ग्रामीण अंचलों में विधुत वितरण व्यवस्था की तो कल्पना ही मात्र की जा सकती हैं। भारी भरकम बिजली बिलों से कराहती जनता इन दिनों अघोषित बिजली कटौती से हलाकान है। बरसात के मौसम में जहरीले जीव जंतुओं का खतरा तो बना ही रहता है उपर से बिजली बंद। जिला मुख्यालय के अधिकांश हिस्सों में शाम होते ही बिजली की आंख मिचौली शुरू हो जाती हैं। विधुत वितरण कंपनी ने चाहें शिकायत दर्ज कराने के लिए भोपाल का नंबर जारी कर रखा हो, लेकिन वह केवल सरकार के दिखावे मात्र के लिए है। जहां से रटा-रटाया जवाब दिया जाता है कि आपकी शिकायत दर्ज कर ली गई है, शीघ्र ही समाधान किया जा रहा है। लेकिन समाधान होता नहीं है। स्थानीय विभागीय अधिकारियों की स्थिति तो यह है कि उनके मोबाइल या तो किसी अन्य नंबर पर डायवर्ट बताते हैं या उठाये नहीं जाते। हालात यह है कि अगर कोई घटना दुर्घटना भी घटित हो जाये ओर उसकी सूचना कोई जागरूक नागरिक देना चाहे तो भी संभव नहीं है। बिजली विभाग की इस भर्राशाही को लेकर सत्ताधारी भाजपा जहां बेखबर रहती हैं तो विपक्ष मौन साधे इसलिए बैठा रहता है कि जनता सरकार से खफा हो जाते। प्रशासन के आला अधिकारियों को इस जनसमस्या से इसलिए कोई सरोकार नहीं है कि उनके बंगलों की लाईट बंद नहीं होती। अगर कुछ समय के लिए होती भी है तो सरकारी खर्च पर जनरेटर लगे हुए हैं। हालात यह हैं कि शहर में बिजली बंद होने से जनता पस्त होती और अधिकारी मस्त नींद लें रहें होते हैं। जनता की मजबूरी यह है कि सिवाय मीडिया के उसकी आवाज उठाने वाला या गुहार सुनने वाला कोई नहीं है। विडंबना यह है कि क्षेत्र के विधायक तो प्रदेश सरकार में मंत्री बनकर बैठ गये लेकिन यहां जनता की समस्याओं के समाधान हेतु कोई नेता या जनप्रतिनिधि नहीं नजर आता है। राजनीतिक दलों में आज ऐसा कोई नेता नजर नहीं आता कि जनता उसे अपनी समस्याएं बताये ओर वह उसका समाधान करवा सकें। विपक्ष की तो छोड़िए सत्ता पक्ष में भी ऐसा कोई नेता नजर नहीं आता है। यही कारण है कि आज अफसरशाही पुरी तरह से बेलगाम हो चुकी है। अब इसका एक ही उपाय बचा है कि जनता अपनी आवाज बुलंद करते हुए खुद सड़कों पर उतर आए। शायद इसी का इंतजार अफसर नेताओं को भी है।
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