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Friday, 30 October 2026
हरदा

महकती अमराइयां हो रहीं खामोश, विलुप्ति की ओर बढ़ रहे देशी आम के पेड़

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अनोखा तीर, मसनगांव। कभी मसनगांव से हरदा तक स्टेट हाईवे के दोनों ओर फैली अमराइयां गर्मियों में देशी आम की भीनी-भीनी खुशबू से महक उठती थीं। हरदा शहर से बाहर निकलते ही कच्चे आम की महक राहगीरों को अपनी ओर आकर्षित करती थी, लेकिन अब यह नजारा बीते दिनों की बात बनता जा रहा है। वर्षों पुराने देशी आम के पेड़ लगातार सूख रहे हैं और उनकी जगह सूखे तने दिखाई दे रहे हैं। इसके साथ ही क्षेत्र की पारंपरिक देसी आम की कई किस्में भी धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई हैं। एक समय था, जब मसनगांव सहित आसपास के अधिकांश गांवों में आम के बड़े-बड़े बगीचे हुआ करते थे। गर्मी के मौसम में पेड़ों पर लदे फलों से अमराइयां गुलजार रहती थीं। ग्रामीण परिवारों की आमदनी का यह महत्वपूर्ण स्रोत था। बगीचों के ठेके हजारों रुपये में उठते थे और दूर-दूर से व्यापारी देसी आम खरीदने पहुंचते थे। अब अधिकांश बगीचे खत्म हो चुके हैं और कहीं-कहीं ही पुराने देसी आम के पेड़ दिखाई देते हैं। क्षेत्र में आमन, गुठली, नकवा, गोलियां और लाल पट्टा जैसी देसी किस्में अपनी मिठास, सुगंध और स्वाद के लिए प्रसिद्ध थीं। इनकी पहचान अलग-अलग आकार, रंग और स्वाद से होती थी। समय के साथ किसानों ने अधिक खेती योग्य भूमि और आधुनिक फसलों के उत्पादन पर ध्यान दिया, जिससे खेतों में खड़े पुराने आम के पेड़ों की उपेक्षा होने लगी। देखभाल के अभाव में अधिकांश पेड़ सूख गए और कई किस्में अब केवल बुजुर्गों की यादों में ही बची हैं। गांव के बुजुर्ग अमरदास भायरे बताते हैं कि देदली नदी से लेकर मोरगा नाले तक आम के पेड़ों की लंबी कतारें हुआ करती थीं। गर्मियों में बच्चे और ग्रामीण इन पेड़ों की छांव में समय बिताते थे और देसी आमों का स्वाद लेते थे। आज उन स्थानों पर अधिकांश पेड़ समाप्त हो चुके हैं और अमराइयों की पहचान भी मिटती जा रही है। राजा भायरे ने अपने घर के आसपास उन्नत किस्मों के कई आम के पौधे लगाए हैं। उनका कहना है कि नई किस्मों से फल तो मिलते हैं, लेकिन देसी आम जैसी मिठास, सुगंध और भरपूर पैदावार इनमें नहीं है। पहले पूरे गांव में आम के बगीचे होते थे, जबकि अब अचार बनाने के लिए कैरी भी सीमित मात्रा में उपलब्ध हो रही है।
धार्मिक परंपराओं से भी जुड़ा है आम का पेड़
आम का पेड़ केवल फल देने वाला वृक्ष नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। मांगलिक कार्यों में आम के पत्तों की तोरण शुभ मानी जाती है। हवन और यज्ञ में आम की लकड़ी का विशेष महत्व है। दीपावली सहित कई पर्वों पर आम के पत्तों की मांग बढ़ जाती है। पेड़ों की लगातार घटती संख्या के कारण अब धार्मिक कार्यों के लिए भी आम के पत्ते और लकड़ी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।
संरक्षण की जरूरत
पर्यावरण प्रेमी गौरी शंकर मुकाती और ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते देशी आम की पारंपरिक प्रजातियों का संरक्षण नहीं किया गया और नए पौधे नहीं लगाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां केवल पुस्तकों और बुजुर्गों की बातों में ही देसी आम की खुशबू और स्वाद जान पाएंगी। ग्रामीणों ने प्रशासन और वन विभाग से देसी आम की प्रजातियों के संरक्षण तथा पौधरोपण के लिए विशेष अभियान चलाने की मांग की है।

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