-न गेहूं की कीमत मिल रही और न ही खरीद रही सरकार
नितेश गोयल, हरदा। संपूर्ण जगत का पेट भरने वाला अन्नदाता किसान कभी फसल बोने से पहले यूरिया और डीएपी के लिए मारामारी करता है, तो कभी पेट्रोल और डीजल पंपो पर लाईन लगकर जद्दोजहद करता है। किसी तरह फसल बोकर ठंड की सर्द रातों में बिजली की आंख मिचौली के बीच गेहंू की फसल पैदा करने के लिए दिन रात एक कर देता है। कर्ज के बोझतले दबा यह अन्नदाता जब फसल पैदा होती है तो उसे एक उम्मीद जागती है कि उसकी फसल इस बार अच्छी हुई है। यदि अच्छा दाम मिला तो वह अपने कर्जें भी खत्म कर देगा और अपने बेटे-बेटियों का विवाह भी बड़े धूमधाम से तय समय पर कर देगा। जब वह अपनी फसल काटकर घर के चौबारे में ढेर लगाकर रख देता है और उम्मीद करता है कि इस बार जैसा सरकार ने चुनाव से पहले कहा था गेहूं हम २७०० रुपए क्विंटल खरीदेंगे वह वादा सरकार भूल जाती है। राजस्थान की सरकार तो वहां के किसानों को २७२५ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से देती है, लेकिन मध्यप्रदेश की सरकार सिर्फ २६२५ रुपए क्विंटल ही दे रही है। लेकिन किसान का यह संघर्ष यहीं नही खत्म होता, किसान सोचता है कि यदि वह इस गेहूं को मंडी बेचने जाएगा तो निर्यात पर लगे प्रतिबंध के कारण मंडी में गेहूं २ हजार से २२०० रुपए प्रति क्विंटल ही बिकेगा। अब सरकार जो भाव खरीद रही है, उसी में बेचकर किसी तरह बेटे-बेटी की शादी और अपना कर्जा उतारने की जुगत बिठा लेता है। लेकिन किसान का औने-पौने दामों पर फसल बेचने का यह सपना भी पूरा नहीं हो पा रहा है। मध्यप्रदेश की सरकार द्वारा पहले जारी की गई निर्धारित तिथियों पर खरीदी शुरु नहीं की गई। कभी युद्ध के कारण वारदान की कमी बताई गई तो कभी गोडाउनों की कमी का बहाना कर खरीदी कार्य को कछुआ गति से चलाया जा रहा है। यदि इस गति से गेहूं की खरीदी समर्थन मूल्य पर की गई तो पूरे एक साल तक किसान फसल बेचने के लिए परेशान होता रहेगा। बीते २५ वर्षों से पहली बार ऐसा हो रहा है कि गेहूं खरीदी में सरकार की रुचि नहीं दिखाइ दे रही है।
सेटेलाईट बता रहा नहीं बोया तुमने गेहूं
छोटे से लेकर बड़े किसान तक गेहूं उपार्जन की स्लॉट बुकिंग से परेशान हैं। किसी किसान की स्लॉट बुकिंग इसलिए नहीं हो रही है कि उसका बैंक खाता आधार लिंक न होना बताया जा रहा है। किसी किसान को असत्यापित किसान बताया जा रहा है तो किसी किसान की स्लॉट बुकिंग इसलिए नहीं हो रही है कि सेटेलाईट उनके खेतों में गेहूं बोना ही नहीं बता रहा है। ऐसा लगता है कि सेटेलाईट वर्तमान में सर्वे कर रहा है, जब किसानों ने गेहूं की फसल काटकर मूंग बो दी है और उनके खेत हरे-भरे हो गए हैं। नए-नए तरीके से किसानों को परेशान करने के लिए फंडे अपनाए जा रहे हैं। वर्तमान में सिर्फ छोटे किसानों के लिए ही स्लॉट बुकिंग शुरु की गई है, लेकिन वह किसान भी स्लॉट बुकिंग के लिए रोजाना परेशान हो रहे हैं। देखने वाली बात यह है कि साल भर में गेहूं और चने की फसल ही होती है जिसे बेचकर अपै्रल और मई में प्रदेश का किसान अपने बेटे-बेटियों की शादी से लेकर साहूकारों के लेनदेन और बैंक केसीसी का अलटा-पलटा कर पाता है, यदि किसान की यह उपज भी समय पर नहीं बिकी तो किसान को इतना अधिक आर्थिंक संकट आ जाएगा कि उसके सामने मंडियों में ही औने-पौने दामों पर फसल बेचने को मजबूर होना पड़ेगा।
गेहूं पैदा कर पछता रहा अन्नदाता

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