मध्‍य प्रदेश के आयुर्वेद कॉलेजों को नहीं मिल रहे शिक्षक, विशेषज्ञ डॉक्टरों की भी कमी

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अनोखा तीर भोपाल:-प्रदेश में भारतीय चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने की बात खूब होती है, पर सच्चाई वैसी नहीं है। स्थिति यह है के प्रदेश के सात आयुर्वेद कॉलेजों में तीन में एमडी-एमएस कोर्स ही संचालित नहीं हो पा रहे हैं। इसमें इंदौर, बुरहानपुर और जबलपुर शामिल हैं।

अन्य कॉलेजों की बात करें तो रीवा में पांच, ग्वालियर में पांच और उज्जैन में 14 सीटें हैं। भोपाल के सरकारी आयुर्वेद कालेज में जरूर 75 सीटें हैं। यहां पीजी की और सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव है। प्रदेश चार निजी कॉलेजों में भी एमडी-एमएस कोर्स संचालित हो रहे हैं, लेकिन यहां एक वर्ष की शुल्क अलग-अलग विशेषज्ञता के अनुसार तीन से पांच लाख रुपये तक है, जबकि सरकारी कॉलेजों में एक लाख रुपये के लगभग है।

शोध भी कम होते हैं

पीजी सीट कम होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि मध्‍य प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयुर्वेद के विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी है। दूसरा बड़ा नुकसान यह है कि निजी और सरकारी आयुर्वेद कालेजों को फैकल्टी नहीं मिल पा रहे हैं। 30 प्रतिशत फैकल्टी दूसरे राज्यों के हैं। तीसरा शोध कार्य कम होते हैं। हर एमडी-एमएस विद्यार्थी को दूसरे वर्ष शोध करना पड़ता है, पर सीटें कम होने से शोध भी कम होते हैँ।

प्रदेश के सभी पुराने मेडिकल कालेजों में बड़ी संख्या में पीजी सीटें हैं, आयुर्वेद के वर्षों पुराने तीन कालेजों में एमडी-एमएस कोर्स संचालित नहीं हो रहा है। इससे डाक्टरों का ही नहीं आमजन का भी नुकसान है। -डाॅ.राकेश पाण्डेय, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आयुष मेडिकल एसोसिएशन

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