आजादी के मतवालों और हुनरमंदों की धरा हैं मसनगांव

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11 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों सहित शिक्षा, कला संस्कृति और परिश्रम की पराकाष्ठा करने वाली प्रतिभाओं से अटा पड़ा है यहां का इतिहास

आज समाज के इतिहास पुरुषों को नमन करते उनके परिजनों का होगा सम्मान

अनोखा तीर, हरदा। मध्यप्रदेश के हरदा जिले का एक कस्बाई गांव मसनगांव अपने भीतर अनेक उपलब्धी पूर्ण इतिहास समेटे हुए है। कहने को तो यह गांव हरदा विकासखंड की एक ग्राम पंचायत भर है लेकिन इस गांव ने न केवल आजादी की लड़ाई में भरपूर योगदान दिया, अपितु आजादी के बाद मध्यप्रदेश गठन से पूर्व ही प्रथम मनोनीत सरकार में मंत्री तक दिया है। हरदा का प्रथम जनपद अध्यक्ष जहां इसी गांव से बना था, तो वहीं हरदा जिला बनने उपरांत प्रथम जिला पंचायत अध्यक्ष भी इसी गांव ने दिया था। जब गावों में स्कूली शिक्षा भी दुभर हुआ करती थी तब इस गांव के युवा देश के महानगरों और विदेश तक शिक्षा प्राप्त कर वकील,  इंजिनियर तथा डाक्टर बन गए थे। राजनीतिक और शिक्षा के क्षेत्र में ही यह गांव अग्रणी भूमिका नहीं निभा रहा था, बल्कि कला संस्कृति के क्षेत्र में भी यहां की प्रतिभाएं प्रदेश में अपनी पहचान कायम किए हुए थी। आज विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर इसी मसनगांव में विशाल सरोकारी सम्मेलन दौरान जहां एक ओर प्रकृति की सेहत सुधारने पर चिंतन मनन होगा, वहीं गांव के ऐसे इतिहास पुरुषों को नमन करते हुए उनके परिजनों को सम्मानित भी किया जाएगा।

  

मसनगांव की धरती को विश्व पटल पर पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक अलग पहचान दिलाने वाले, हरदा जिला पंचायत के प्रथम अध्यक्ष पर्यावरण प्रेमी गौरीशंकर मुकाती द्वारा इस बहुउद्देशीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। सरकारी तामझाम से परे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मिशन लाइफ अभियान को केन्द्र में रखते हुए ‘कहीं देर ना हो जाए …Óटेग लाइन के साथ मिट्टी, मनुष्य और पर्यावरण पर  विषय विशेषज्ञों का सारगर्भित उद्बोधन होगा। वहीं दूसरी ओर आत्मनिर्भर कृषक- आत्मनिर्भर कृषि का आव्हान करते किसानों के खेतों की मेढ़ो पर पौधारोपण अभियान को गति देने यहां तीन देशों की कंपनियों के निर्णायक प्रतिनिधि भी उपस्थित रहेंगे। भारत सरकार के आदिम जाति कल्याण राज्य मंत्री डीडी उइके के मुख्य आतिथ्य में होने वाले इस आयोजन दौरान गांव के 20 प्रतिभावान परिवारों को सम्मानित किया जाएगा। जिसमें 11 वह परिवार शामिल हैं जिनके पूर्वजों ने अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेते हुए आजादी के आंदोलन में अपना सक्रिय योगदान दिया था।

मसनगांव से थे 11 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

इस गांव के ग्राम कोटवार उमराव कतिया के परिवार से ही आजादी की लड़ाई में तीन लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा दिया गया। जिसमें 23 मई 1911 को जन्मे रामेश्वर उमराव जी अग्निभोज ने तो आजाद भारत में अपनी छाप पूरे हिन्दुस्तान में कायम की थी। ग्राम कोटवार के यहां जन्में इस युवा की प्रतिभा को देखते हुए पिता उमराव जी ने तंगहाली के बाबजूद उन्हें उच्च शिक्षा प्रदान कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। प्रारंभिक शिक्षा हरदा में हासिल करने उपरांत उन्होंने काशी एवं नागपुर विश्वविद्यालय से बीए एलएलबी तक की शिक्षा हासिल की थी। स्वतंत्रता आंदोलन से ही राजनीति में रुचि रखने वाले रामेश्वर अग्निभोज जहां राष्ट्रीय बालक मंडल के  सदस्य के रूप में सक्रिय रहे तो वहीं साइमन कमीशन के समय कांग्रेस के आंदोलन में भी शामिल रहे। आजादी उपरांत बनी अगठित मध्यप्रदेश की पहली सरकार में लोक निर्माण मंत्री बने। वहीं 1952 से 1958 तक राज्यसभा सदस्य भी रहे थे।  सन 1962 में दमोह की सुरक्षित सीट से विधानसभा चुनाव जीत विधायक भी बने थे। वहीं उनकी श्रीमती गुलाब बाई 1957 के विधानसभा चुनाव में टिमरनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुनी गई थी। इतना ही नहीं बल्कि रामेश्वर अग्निभोज ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से असहमत होते हुए कांग्रेस छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सांसद तथा प्रसिद्ध किसान नेता प्रोफेसर गोगिनेनी रंगा नायकुलु के साथ स्वतंत्र पार्टी का गठन भी किया था। जिसके बेनर तले पूरे देश में चुनाव लड़ा गया था। रामेश्वर अग्निभोज के ही परिवार से उनके भतीजे रामलाल अग्निभोज और शिवलाल अग्निभोज भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हैं। इसी तरह दौलत सिंह ठाकुर, सालकराम गुर्जर, हरकिशन गुर्जर, शिवनारायण बांके, भगवानदास बांके, गोपी किशन जोशी, नाथुराम जोशी, रामकिशन सोनी ने आजादी के आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई थी। जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्त हुआ था। इसमें गोपी किशन जोशी हरदा जनपद के प्रथम अध्यक्ष भी रहे थे।

जिन्होंने की थी परिश्रम की पराकाष्ठा

मसनगांव के ही कुछ ऐसे जुझारू लोग भी रहे हैं जिन्होंने परिश्रम की पराकाष्ठा करते हुए अपने बलबूते तंगहाली के बाबजूद समाज में अपना मुकाम बनाया अपितु बच्चों को आत्मनिर्भरता के गुर भी सिखाए थे। ऐसे ही परिश्रमी व्यक्तित्व में शामिल हैं मसनगांव के राजाराम मुकाती जिन्हें वैसे तो पारिवारिक बंटवारे में 6 एकड़ जमीन मिली थी लेकिन उन्होंने उसका उपयोग न करते हुए स्वयं मेहनत मजदूरी कर अपनी आजीविका निर्वहन का रास्ता अपनाया। बच्चों को उच्च शिक्षा प्रदान कराते हुए जहां इंजीनियरिंग की शिक्षा दिलाई तो वहीं अपनी मेहनत के बलबूते 30 एकड़ कृषि भूमि क्रय कर प्रगतिशील किसान के तौर पर मुकाम हासिल किया। उन्हीं के दिए संस्कारों से पल्लवित होकर आज उनके पुत्र गौरीशंकर मुकाती जहां भारतीय जनता पार्टी में वरिष्ठ नेता के तौर पर स्थापित हुए, तो वहीं हरदा जिले के प्रथम जिला पंचायत अध्यक्ष भी बने थे। वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण के साथ ही धरती की सेहत सुधारने वाले विभिन्न स्तरों पर कार्य करते हुए अपनी छाप सात समुंदर पार तक कायम कर चुके हैं। गौरीशंकर मुकाती द्वारा जहां वनांचल में वनवासियों को कुपोषण के स्थाई समाधान तथा आर्थिक सुदृढ़ता की दृष्टि से आगन धन का आव्हान करते हुए गरीब परिवारों के आवासीय परिसरों में घर आंगन और बाड़े की बागुड़ में सागौन तथा फलदार पौधों का रोपण कराया गया, तो वहीं किसानों के लिए आम के आम गुठलियों के दाम जैसा नारा देकर अपना अभियान चलाया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के क्रांतिकारी नारे की तर्ज पर ही वर्तमान में उन्होंने तुम मुझे मेढ़ दो मैं तुम्हें पेड़ दूंगा नारा बुलंद करते हुए नर्मदा के तटवर्ती क्षेत्रों में लगभग डेढ़ करोड़ पौधों का रोपण किसानों के खेतों की मेढ़ो पर कराया है। आज प्रकृति की सेहत सुधारने को लेकर होने जा रहे चिंतन मनन का यह आयोजन भी उनके ही दिमाग की उपज है। इस तरह राजाराम मुकाती की दूरदर्शिता के फलस्वरूप आज उनके पुत्र पौत्र समाज में अपनी अलग पहचान कायम किए हुए हैं। इसी गांव के मांगीलाल राठौर वैसे तो हरदा के मूल निवासी थे। लेकिन बचपन में ही पिताजी ने खाली डिब्बे लेकर अपना काम खुद करने की नसीहत देते हुए घर से निकाल दिया था। वह शहर के नजदिकी गांव मसनगांव में आकर मेहनत मजदूरी करते हुए घानी से तेल निकालने का कार्य करने लगे। लोगों के बीच अपने कार्य और व्यवहार से लोकप्रिय होते गए। उन्होंने गांव में ही एक परचून की दुकान भी शुरू कर ली थी। अपनी मेहनत और ईमानदारी के साथ व्यवहारकुशलता से वह इस क्षेत्र के बड़े व्यापारी के तौर पर अपनी छाप कायम करने में सफल हुए। आज उनका परिवार गांव के प्रतिष्ठित परिवारों में गिना जाता है। इसी तरह इसी गांव के जगन्नाथ टेलर की भी सफलता की अपनी कहानी है। महज लोगों के छोटे मोटे कपड़े सिलने और पुराने कपड़ों को सुधारने का कार्य करते हुए अपना गुजर-बसर करने वाले जगन्नाथ टेलर उर्फ नन्नू दर्जी ने घर में ही आटा चक्की लगा ली थी। मेहनत और ईमानदारी के बल पर ही समय के साथ साथ नन्नू दर्जी नन्हे भैया और फिर नन्हेलाल जी हो गये। वह गांव के संपन्न किसानों में शामिल हो गए।

शिक्षा और संगीत का अलख जगाया

जिस समय आर्थिक तंगी और सामाजिक जागरुकता के अभाव चलते शहरों क्षेत्रों में भी शिक्षा का प्रतिशत काफी कम था, ऐसे समय में मसनगांव के युवा रमणलाल पटेल ने विदेश जाकर एमटेक (मास्टर ऑफ टेक्नोलॉजी) की शिक्षा प्राप्त की थी। एक ग्रामीण परिवेश के किसान परिवार से इस तरह विदेश जाकर उच्च प्राप्त करना उस समय के लिए किसी सपने से कम नहीं था। इसी गांव के एक अन्य युवा राजकिशोर ने बगैर किसी कोचिंग के केवल स्कूली शिक्षा और स्वयं अध्ययन के बल पर आईआईटी कर मोटे पैकेज पर नौकरी हासिल कर ली थी। लेकिन वह केवल अपनी इस उपलब्धि से संतुष्ट नहीं होकर आईएएस की तैयारी में जुट गया। जब आईएएस की परीक्षा दी और पहली बार में सफलता नहीं मिलने पर इस होनहार युवा ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी। यह एक दुखद पहलू था। गांव के ही सुतारी का काम करने वाले रामगोपाल मालवीय भी दूरदृष्टा साबित हुए। खेती-बाड़ी और दैनिक घरेलू उपयोग में काम आने वाले लकड़ी के उपकरण व सामान बनाने वाले रामगोपाल मालवीय ने अपने बच्चों को पैतृक व्यवसाय में नहीं सिखाया या लगाया, बल्कि उन्हें उच्च शिक्षा की ओर ही अग्रेषित किया। महज सुतारी कार्य के बलबूते उन्होंने अपने 4 बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई, जिससे आज वह सभी उच्च पदों पर आसीन हैं।  इसी गांव में कला संगीत के जादूगर भी ऐसे थे जिनके नाम की तूती आस-पास के जिलों में गूंजती थी। रमजान चाचा, जी हां वह धर्म से तो मुसलमान थे लेकिन संगीत कला में ऐसे निपूर्ण थे कि उनकी आवाज और गायन के सब कायल थे। मसनगांव ही नहीं बल्कि आस-पास के गांव और जिलों में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी बड़ी मांग हुआ करती थी। धार्मिक आयोजन में रमजान चाचा के भजन और गीत संगीत लोगों की पसंद बन गया था। इसी तरह शंकरलाल जोशी हार्मोनियम बादक के तौर पर अपनी छाप कायम कर चुके थे। कंठ पर तो जैसे स्वयं सरस्वती विराजमान थी। उन दिनों गांवों में रामलीला का काफी प्रचलन था। अब होशंगाबाद वर्तमान नर्मदापुरम, खंडवा, देवास, सिहोर जिले के किसी भी गांव में रामलीला का आयोजन हो तो शंकरलाल जोशी को ही बुलाया जाता था। मसनगांव की उपरोक्त प्रतिभाओं में एक ऐसी भी प्रतिभा थी जिसका काम ही लोगों को खुशी बांटना था। आज जिस हंसी के लिए शहरों में लाफ्टर क्लब चल रहे हैं, राष्ट्रीय स्तर पर लाफ्टर चैलेंज-शो चलाएं जा रहे हैं, मसनगांव में यह कार्य एक चलता फिरता व्यक्ति तुलसीराम मानकर सहज ही किया करता था। वह हंसी खुशी की चलती फिरती दुकान थी। रमजान चाचा और शंकरलाल जोशी की तरह ही तुलसीराम मानकर को भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विशेष रूप से बुलाया जाता था। वह जोकर बनकर लोगों के मनोरंजन का कार्य करते थे। आज यह प्रतिभाएं तो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके कार्य, उपलब्धियां, उनके दिए संस्कार, समाज के प्रति समर्पण आदि वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहे इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए विश्व पर्यावरण के अवसर पर उनका स्मरण किया जाएगा। पर्यावरण प्रेमी गौरीशंकर मुकाती द्वारा ऐसे लोगों के परिजनों को सम्मानित करते हुए ताम्रपत्र पर उन विभूतियों का नाम अंकित किया जा रहा है।

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